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Thread: ECONOMICS (G.S.) matter for HINDI MEDIUM.......

  1. #1
    Not too shy to talk saarthak's Avatar
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    Default ECONOMICS (G.S.) matter for HINDI MEDIUM.......

    दोस्तों, मैं हिंदी मीडियम के लिए ECONOMICS SECTION शुरू कर रहा हूँ ! इस बारे में मैं ये कहना चाहूँगा कि मैं ये THREAD मृणाल जी से प्रेरित होकर लिख रहा हूँ . मेरा ये प्रयास कितना सार्थक होगा ये तो आप लोग ही बता पाएंगे ..... कोशिश यही है कि अर्थशास्त्र को सरलता से प्रस्तुत कर सकूं ........
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  2. #2
    Not too shy to talk saarthak's Avatar
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    Default क्या है शेयर बाजार?

    क्या है शेयर बाजार?


    शेयर बाजार आखिर है क्या? बाजार बोले तो किराना बाजार, मछली बाजार, कपडा बाजार तो समझ में आता है , जहां खरीदने वाले और बेचने वाले इकट्ठे होकर, चीजों या सेवाओं की खरीद-फरोख्त करते हैं। जैसे फल बाजार में फल बिकते हैं, जैसे हर शहर में चौराहों पर सुबह-सुबह मजदूर बिकते हैं या और भी बहुत कुछ, उसी तरह शेयर बाजार भी बाजार ही है, लेकिन कुछ खास, और बाजारों से कुछ अलग किस्म का।

    सीधे कहा जाए, तो शेयर बाजार एक ऐसी जगह है, जहां कंपनियों के शेयरों की खरीद-फरोख्त होती है। भारत में अंग्रेजों के जमाने में शेयर बाजार शुरू हुआ था, और पहले शेयर एक पेड के नीचे मजमा लगाकर बेचे जाते थे। बाद में यह ट्रेडिंग रिंग के रूप में बदला, जिसमें ब्रोकर यानी दलाल लोग इकट्ठे होकर शेयर बेचते थे। अब यह अत्याधुनिक कंप्यूटर प्रणाली से लैस तेज गति की व्यवस्था है, जिसमें एक साथ लाखों खरीददार और विक्रेता, दूरसंचार व्यवस्थाओं के जरिए केंद्रीय कंप्यूटर से जुडते हैं। खरीदने-बेचने वाले ये लोग इंटरनेट सुविधा वाले अपने कंप्यूटर या ब्रोकर के कंप्यूटर के जरिए अपने आर्डर को शेयर बाजार में दर्ज कराते हैं और खरीदे-बेचे जाने वाले शेयरों की संख्या और कीमत का मिलान केंद्रीय कंप्यूटर से होते ही सौदा दर्ज हो जाता है। पूरी प्रक्रिया में आर्डर केंद्रीय कंप्*यूटर को भेजा जाता है, उसका कन्फर्मेशन होता है, सौदा तय होता है और उसका निबटान होता है। यह सारी प्रक्रिया सेकेंडों में पूरी हो जाती है।

    बाजार का खास पहलू है उस कीमत की खोज, जिस पर सौदा तय हो सके। बेचने वाला ज्यादा से ज्यादा कीमत चाहता है और खरीदने वाला कम से कम में खरीदना चाहता है। यह सौदेबाजी जब समान कीमत पर पहुंचती है तभी सौदा तय होता है। चूंकि शेयर बाजार में एक साथ बहुत भारी तादाद में खरीददार-विक्रेताओं का आपसी सम्पर्क होता है इसलिए सौदे भी भारी तादाद में फटाफट पूरे होते हैं।

    शेयर बाजार में शेयर बिकते हैं। शेयर क्या हैं? शेयर का मतलब है हिस्सा। किसी कंपनी का शेयर लेने का मतलब है उस कंपनी में आपने हिस्सेदारी ले ली। एक लाख शेयर वाली किसी कंपनी के दस हजार शेयर खरीदकर आप उस कंपनी के दसवें हिस्से के मालिक बन जाते हैं। उद्यमी और बिजनेसमैन, जो कोई कारोबार खडा करना या बढाना चाहते हैं, वे योजना बनाते हैं कि वे नई कंपनी शुरू करके या पुराना कारोबार बढा़कर ढेर सारा पैसा बना सकते हैं। लेकिन उनके पास इतनी काफी पूंजी नहीं होती कि वे बाहर से पैसा लिए बिना अपनी पूरी योजना को लागू कर सकें। तब निवेशक आगे आता है और कंपनी के शेयर यानी हिस्सेदारी खरीदकर उद्यमी को पूंजी मुहैया कराता है।

    आम जनता को शुरुआती शेयर खरीदने के प्रस्ताव IPO (Initial Public Offer) के जरिए दिए जाते हैं। अब, जो निवेशक IPO में शेयर खरीद लेता है, वह अनन्तकाल तक तो शेयर अपने पास रखना चाहेगा नहीं। उसकी अपनी दूसरी जरूरतें हो सकती हैं या किसी और कंपनी में पैसा लगाने के लिए वह अपना पैसा खाली करना चाहता है। लेकिन कंपनी तो उसका पैसा इतनी जल्दी लौटा नहीं सकती, क्योंकि उगाहे गए पैसे को कंपनी ने कारोबार की ठोस चीजों, जैसे मशीनरी, जमीन, इमारत निर्माण आदि में लगा दिया होता है जिसे चाहकर भी तत्काल खाली नहीं किया जा सकता। ऐसे में शेयर बाजार वो प्लेटफार्म मुहैया कराता है जिसे Secondary Market यानी दूसरे दर्जे का बाजार कहते हैं। इस बाजार में निवेशकों के बीच लिस्टेड यानी सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों की खरीद-फरोख्त होती है और ऐसी कई हजार कंपनियों के लाखों-करोडों शेयर रोज खरीदे-बेचे जाते हैं।

    शेयर बाजार में लिस्टेड होने के लिए कंपनी को बाजार से लिखित समझौता करना पडता है, जिसके तहत कंपनी अपनी हर हरकत की जानकारी बाजार को समय-समय पर देती रहती है, खासकर ऐसी जानकारियां, जिससे निवेशकों के हित प्रभावित होते हों। इन्हीं जानकारियों के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन होता है और इस मूल्यांकन के आधार पर मांग घटने-बढने से उसके शेयरों की कीमतों में उतार-चढाव आता है। अगर कोई कंपनी लिस्टिंग समझौते के नियमों का पालन नहीं करती, तो उसे डीलिस्ट किया जाता है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है जिसके लिए सरकार ने सेबी (भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड - SEBI) जैसी ताकतवर संस्थाए को कानूनी अधिकार देकर निवेशकों के हित में सक्षम बनाया है।

    मामूली, अनजान सी कंपनियों में निवेश करने की तुलना में जानी-मानी, बडी और मजबूत कंपनी को निवेश के लिए चुनना हमेशा ज्यादा सुरक्षित माना जाता है।
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  3. #3
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    Default Re: ECONOMICS (G.S.) matter for HINDI MEDIUM.......

    nice job sir..

  4. #4
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    Default Re: ECONOMICS (G.S.) matter for HINDI MEDIUM.......

    यह जान कर बड़ा अच्छा लगा की अंग्रेजी माध्यम के अलावा हिन्दी में भी अच्छी सामग्री के लिए किसी ने पहल की है..आने वाले समय के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएँ .fficeffice" /><O></O>

  5. #5
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    Default शेयरों को समूहों में क्यों बांटा जाता है?........

    शेयरों को समूहों में क्यों बांटा जाता है?


    आम तौर पर निवेशकों को हर शेयर के बारे पूरी जानकारी नहीं होती। उनकी मदद के लिए ही एक्सचेंज शेयरों को कुछ खास खूबियों या कमियों के आधार पर श्रेणियों में बांट देते हैं, ताकि निवेशकों को निवेश या ट्रेड करते समय उनके बारे में कुछ आधारभूत बातें साफ हों।

    बीएसई पर शेयरों के कितने समूह हैं?

    बीएसई पर कारोबार करने वाले शेयरों को A, B, T, S, TS और Z समूहों में बांटा गया है। इनके अलावा सिक्युरिटीज के वर्गीकरण के लिए कुछ समूह बनाए गए हैं, जिनमें F और G शामिल हैं।

    समूहों में शेयरों का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता है?

    शेयरों के वर्गीकरण के लिए उनकी बाजार पूंजी (एम कैप), ट्रेडिंग वॉल्यूम, नतीजे, इतिहास, मुनाफा, लाभांश, हिस्सेदारी और इसी तरह के कुछ मानकों का सहारा लिया जाता है। फरवरी 2008 में बीएसई ने शेयरों के वर्गीकरण के लिए तय मानकों को अपडेट किया है।

    A समूह के शेयरों को निवेशक और विश्लेषक सबसे भरोसेमंद मानते हैं। इस वर्ग में शामिल किए जाने के लिए जरूरी मानकों में सबसे महत्वपूर्ण बाजार पूंजीकरण है।

    S समूह में बीएसई इंडोनेक्स्ट सूचकांक के शेयरों को शामिल किया गया है। इस सूचकांक का गठन बीएसई ने 7 जनवरी 2005 को किया था। S ग्रुप में बी समूह के शेयर शामिल होते हैं और इसके अलावा 3 करोड़ रुपए से 30 करोड़ रुपए के बीच की पूंजी वाली कंपनियों, जो केवल क्षेत्रीय एक्सचेंजों में सूचीबद्ध होती हैं, के शेयर भी एस का हिस्सा होते हैं।

    Z समूह के शेयर सबसे ज्यादा गैर भरोसेमंद होते हैं। बीएसई ने यह समूह 1999 में बनाया था। इसमें ऐसी कंपनियों के शेयरों को शामिल किया जाता है, जो सूचीबद्ध होते समय एक्सचेंज द्वारा तय नियमों का पालन करने में असफल रहती हैं। इसमें शेयरधारकों की समस्याओं के प्रति उदासीन और अपने शेयरों के डीमैटेरियलाइजेशन के लिए जरूरी प्रबंध करने में नाकाम रहने वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाता है।

    जो शेयर A, S और Z में शामिल नहीं होते, वे B समूह में होते हैं। मार्च 2008 से पहले इस समूह के शेयर दो समूहों, B1 और B2 में बंटे थे, लेकिन अब इन्हें एक ग्रुप बना दिया गया है।

    T समूह में वे शेयर होते हैं, जिन्हें ट्रेड-टू-ट्रेड (Trade to Trade)आधार पर ही खरीदा-बेचा जा सकता है।

    TS समूह में उन्हें रखा गया है जो इंडोनेक्स्ट इंडेक्स में शामिल हैं और जिनमें ट्रेड-टू-ट्रेड आधार पर कारोबार होता है।

    F समूह के तहत तय आय वाले सिक्युरिटीज को रखा गया है और G ग्रुप में सरकारी सिक्युरिटीज रखे जाते हैं।
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  6. #6
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    Default Re: क्या है शेयर बाजार?

    Quote Originally Posted by saarthak View Post
    क्या है शेयर बाजार?
    आम जनता को शुरुआती शेयर खरीदने के प्रस्ताव IPO (Initial Public Offer) के जरिए दिए जाते हैं।
    Apart from IPO another jargon in share market is FPO( Follow on Public Offer). when any company for the first time lists on the bourses , it is called IPO. The purpose of IPO is already explained above by Saarthak. If the companies ( already listed)still want to raise funds through the public, then they go for FPO.
    The UPA2 govt to fill the gaps of funds to be raised through disinvestment policy is offering its(govt) share to the public by FPO's of NTPC, NMDC and Rural electrification. THE NTPC is lkely to come with its FPO in 1st week of Feb and NMDC and Rural electrification to come with FPO in March end or April.
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  7. #7
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    Default Re: क्या है शेयर बाजार?

    Quote Originally Posted by gjakumar View Post
    Apart from IPO another jargon in share market is FPO( Follow on Public Offer).
    U r right.....Thanks KUMAR for this useful information
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  8. #8
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    Default शेयर बाजार की कुछ शब्दावली ----

    शेयर बाजार की कुछ शब्दावली ----



    खिलाड़ी (Player)

    शेयर बाजार में मध्यस्थों और संस्थागत ब्रोकरों को खिलाड़ी (Player) के नाम से जाना जाता है।
    खिलाड़ी की श्रेणी में ब्रोकर, डीलर, बैंक, मर्चेंट बैंकर, म्यूचुअल फंड आदि आते हैं।


    खुला आदेश (Open Order)

    अगर निवेशक ब्रोकर को लिवाली करने का निर्देश जारी करता है लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ है या वह सौदा रद्द नहीं हुआ है तो उसे खुला आदेश कहा जाएगा।


    खुली बोली (Open Bidding)

    जिस नीलामी में कोई भी आदमी बोली लगा सकता है उसे खुली बोली कहा जाता है।


    ओपन इंडेड म्यूचुअल फंड (Open Ended Mutual Fund)

    इस तरह के म्यूचुअल फंड में कोई भी निवेशक किसी भी समय पैसा लगा सकता है। म्यूचुअल फंड के यूनिट का एनएवी (बाजार भाव) अखबारों में प्रकाशित होता रहता है और परिपक्वता अवधि निश्चित नहीं होती।


    खुलते समय का आदेश (At the Opening Order)

    अगर निवेशक अपने ब्रोकर को बाजार खुलते ही सौदा करने का निर्देश देता है तो उसे खुलते समय का आदेश कहा जाता है।


    ओवरनाइट लोन (Overnight Loan)

    बैंक द्वारा सिर्फ रात भर के लिए दिया गया लोन ओवरनाइट लोन कहलाता है। यह लोन सुबह बैंक को वापस मिल जाता है।


    गन जंपिंग (Gun Jumping)

    कंपनी से संबंधित किसी के सूचना के आम लोगों तक पहुंचने से पहले ही उसके शेयरों में खरीद फरोख्त होने लगती है तो उसे गन जंपिंग कहा जाता है।


    हॉट मनी (Hot Money )

    वह रकम जिसे अक्सर तेजी से एक देश से निकाल कर दूसरे देश में निवेश किया जाता है हॉट मनी कहलाता है। इस तरह के निवेश का एकमात्र मकसद इन देशों के बीच ब्याज दरों और विनिमय दरों में अंतर से मुनाफा कमाना होता है।


    हॉट इश्यू (Hot Issue)

    अगर निवेशकों के बीच किसी पब्लिक इश्यू की भारी मांग है और अनधिकृत बाजार में प्रीमियम पर उसके बड़े सौदे हो रहे हैं तो उसे हॉट इश्यू कहा जाता है।


    खरीदो और रोको नीति (Buy & Hold Strategy)

    अगर कोई निवेशक दीर्घावधि पूंजी लाभ कमाने के मकसद से शेयर खरीद कर उसे लंबे समय तक अपने पास रखता है तो उसे खरीदो और रोको नीति कहते हैं।


    बंद के भाव (Band ke Bhav)

    स्टॉक एक्सचेंजों में खरीद फरोख्त के लिए तय आधिकारिक अवधि के बाद शेयरों का लेनदेन जिस भाव पर होता है उसे बंद के भाव कहते हैं।


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  9. #9
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    Default क्या बला है हेज फंड (Hedge Fund) ...........

    क्या बला है हेज फंड (Hedge Fund)



    एक HEDGE FUND वह फंड है, जो दोनों तरह की लंबी और छोटी अवधि की पोजीशनें लेता है, आर्बिट्रेज का इस्तेमाल करता है, वास्तविक से कम मूल्यांकन वाली प्रतिभूतियों में कारोबार करता है, ऑप्शन व बांड की खरीद-फरोख्त करता है और किसी भी बाजार में न्यूनतम जोखिम पर अधिकतम लाभ की संभावना वाले निवेश को अपनाता है। सैद्धान्तिक रूप से, हेज फंडों का लक्ष्य पूंजी की पूरी सुरक्षा रखते हुए, कैसी भी बाजार परिस्थितियों में अधिकतम रिटर्न हासिल करना और अस्थिरता और जोखिम में कमी लाना होता है।

    हेज फंडों के बारे में माना यह जाता है कि सारे ही हेज फंड अत्यधिक अस्थिर होते हैं। वे विश्वस्तर पर वृहत रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं और शेयर, करेंसी, बाँडों, कमोडिटीज, सोना-चांदी आदि पर बड़े दांव लगाते हैं। लेकिन वास्तव में केवल पांच फीसदी हेज फंड ही वैश्विक वृहत फंड हैं और ज्यादातर हेज फंड डेरिवेटिव सौदों का इस्तेमाल केवल हेजिंग के लिए ही करते हैं।

    इनकी हेजिंग रणनीतियां (Hedging Strategies)प्राय: इस प्रकार की होती हैं-


    • शार्ट सेलिंग- इस रणनीति के तहत शेयरों को धारण किए बिना ही इस उम्मीद में बेचा जाता है कि आगे कीमतें और गिरेंगी। गिरते हुए बाजार में इस तरह उधार शेयर लेकर उनको बेचकर और फिर ज्यादा गिरावट पर खरीदकर पैसा बना्या जाता है। कभी-कभी यह दांव उल्टा भी पड़ जाता है, जैसे कि दिवाली 2008 के अवसर पर जर्मन कार कंपनी वॉक्सवैगन के शेयरों में शार्टसेलिंग की रणनीति के तहत पोजीशन लेने वाले लंदन के बड़े हेज फंडों ने करीब 20 अरब डॉलर का घाटा उठाया और उनमें से कई दिवालिया हो गए।

    • आर्बिट्रेज- आपसी संबंधित प्रतिभूतियों की कीमतों में अपर्याप्तता का लाभ उठाना।

    • वित्तीय संकट या दिवालिएपन की गिरफ्त में आई कंपनियों की महा-छूट पर उपलब्ध प्रतिभूतियों में निवेश करना, जो तरलता के मूल्यांकन से काफी नीचा होता है।

    • खास मौकों पर जमानती निवेश, जैसे कंपनियों का मर्जर, विभाजन, दिवालिएपन से बाहर आने की प्रक्रिया, अधिग्रहण आदि।

    • किसी सुरक्षित वित्तीय परिसम्पत्ति, सूचकांक या अऩ्य निवेश पर आधारित मूल्यांकन वाले वायदा और विकल्प सौदों में कारोबारी विकल्पों पर अमल करना।



    पहला हेज फंड Alfred W. Jones (Sociologist, author, and financial journalist) द्वारा 1949 में बनाया गया था, जिसका लक्ष्य यह था कि जिन शेयरों में लंबी अवधि के लिए पोजीशन ली गई है, उनके जोखिमों को अन्य शेयरों की शार्ट-सेलिंग के जरिए घटाया जाएं। उसने पहली बार शार्ट-सेलिंग, लीवरेज और प्रेरक शुल्क का आपसी सामंजस्य के साथ प्रयोग किया।

    आज 20 फीसदी से अधिक गति से सालाना बढती हेज फंडों की दुनिया में 8 हजार से ऊपर हेज फंड काम कर रहे हैं और अधिकांश हेज फंड उच्चस्तर पर विशेषीकृत हैं। उनकी प्रबंधन टीमें अपनी अलग-अलग किस्म की खासियतों के लिए पहचानी जाती हैं।

    जिस तरह परंपरागत इक्विटी फंड या म्युचुअल फंड पूरी तरह से बाजार जोखिम के प्रति खुले होते हैं, वैसा हेज फंडों के साथ नहीं होता। अधिकांश हेज फंडों का प्रदर्शन बांड या इक्विटी बाजारों की दिशा पर ही निर्भर नहीं होता। इसके अलावा, ज्यादातर हेज फंडों के प्रबंधक अपनी एक निर्धारित सीमा से अधिक निवेश राशि स्वीकार नहीं करते। वे उतनी ही राशि का प्रबंधन करते हैं, कि जिससे ज्यादा हो जाने पर उन्हें रिटर्न प्रभावित होने की आशंका होती है। इनके प्रबंधक उच्च पेशेवर, अनुशासित और विश्वसनीय रूप से योग्य माने जाते हैं।

    हेज फंडों के लिए कोई नियामक संस्था नहीं है। हेज फंडों में केवल कुछ ही निवेशक निवेश करते हैं, यानी व्यापक रूप से ये फंड जनता से पैसा इकट्ठा नहीं करते। इनके विशिष्ट निवेशकों को निवेश की गई रकम के अनुपात में रिटर्न मिलता है। इनके विशिष्ट निवेशकों की विशिष्टता इसी से जाहिर हो जाती है, कि अमरीका में एसईसी के नियमों के अन्तर्गत ये केवल ऐसे विशिष्ट निवेशकों का पैसा स्वीकार कर सकते हैं जिनकी नेटवर्थ 10 लाख डॉलर से ज्यादा हो या आमदनी 2 लाख डॉलर (अगर शादीशुदा हैं तो 3 लाख डॉलर) से कम नहीं हो। कोई अंकुश न होने के चलते ये हेज फंड दुनिया भर में अच्छी निवेश संभावना की तलाश में घूमते रहते हैं और जैसा मौका देखते हैं, उसी के अनुरूप रणनीति पर अमल करते हैं। इस बिंदु पर हेज फंडों के साथ जोखिम अधिक माना जा सकता है। हेज फंडों के लिए रेगुलेटरी अथॉरिटी न होने के साथ कोई ऐसी रेटिंग एजेंसी भी नहीं है जो निवेशकों को यह आकलन करने में मदद कर सके, कि कौन सा हेज फंड ज्यादा या कम अच्छा है।


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  10. #10
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    Thumbs up Re: ECONOMICS (G.S.) matter for HINDI MEDIUM.......

    क्या है शरिया इंडेक्स? (SHARIAH INDEX)



    शरिया इंडेक्स उन कंपनियों पर आधारित इंडेक्स है, जिनमें इस्लामिक कानून के मुताबिक निवेश किया जा सकता है। अभी तक बनाए गए अधिकतर शरिया इंडेक्स मौजूदा या अंडरलाइंग इंडेक्स पर आधारित हैं। ऐसे इंडेक्स में शामिल कंपनियों की जांच एक ऐसे बोर्ड द्वारा की जाती है, जिसे कुरान के सिद्धांतों की अच्छी जानकारी होती है।



    कंपनियों की जांच किस तरह से की जाती है?

    कंपनियों की जांच दो स्तरों पर की जाती है। पहले उस क्षेत्र के आधार पर जांच की जाती है, जिससे कंपनी जुड़ी होती है। इसके बाद कुछ ऑपरेटिंग रेशियो के आधार पर जांच की जाती है। उदाहरण के लिए किसी इंडेक्स में शामिल वैसी सभी कंपनियों जिनका संबंध पोर्क, एल्कोहल, जुआ, वित्त, तंबाकू, पोर्नोग्राफी, सोने-चांदी, नकदी के कारोबार से जुड़ा होता है को शरिया इंडेक्स में शामिल नहीं किया जाता है।

    इनके अलावा विज्ञापन और मीडिया (अखबार और कुछ अन्य मामलों को छोड़ जिनका विश्लेषण व्यक्तिगत आधार पर किया जाता है) क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को भी शरिया में शामिल नहीं किया जाता है। इसके अलावा जांच के दौरान किसी कंपनी को कर्ज, नकदी और ऐसे गतिविधियों से हासिल आय पर भी विचार किया जाता है, जो कुरान के सिद्धांत के अनुकूल नहीं होती हैं।

    उदाहरण के लिए यदि किसी कंपनी का कर्ज उसके शेयरों का बाजार मूल्य के 33 फीसदी से कम है तो उसे कुरान के सिद्धांतों के अनुकूल माना जाता है। इसके अलावा यदि किसी कंपनी की कुल आय में गैर-अनुमति प्राप्त गतिविधियों से हासिल आय की हिस्सेदारी 5 फीसदी से कम है तो उस कंपनी को शरिया इंडेक्स में शामिल किया जा सकता है। शरिया इंडेक्स में शामिल कंपनियों की संख्या में बढ़ोतरी की जा सकती है।



    शरिया इंडेक्स बनाने के पीछे क्या कारण हैं?

    मार्टिन एल रोस ने इस्लामिक फाइनेंस पर अपने लेख में कहा है कि इस्लामी कानून सूदखोरी और जोखिम से बचने पर जोर देता है। इस्लामी कानून में धन को संपत्ति नहीं माना गया है, जिससे धन से धन अर्जित करने के चलन को मान्यता नहीं दी गई है। इसका मतलब यह है कि ब्याज पर कर्ज मुहैया कराने को इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है। इसके अलावा वैसे उत्पादों की बिक्री को भी इस्लामिक सिद्धांत के खिलाफ माना जाता है, जिनका वजूद निश्चित नहीं है। यहां बीमा उत्पादों का उदाहरण दिया जा सकता है, जिसे भविष्य में किसी घटना की आशंका को देखते हुए खरीदा जाता है।



    क्या भारत में शरिया इंडेक्स है?

    शरिया इंडेक्स में भारतीय कंपनियों को पहले भी शामिल किया जाता रहा है, लेकिन भारतीय शेयर बाजार पर आधारित दो शरिया इंडेक्स सबसे पहले स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (Standard & Poor's) ने फरवरी 2008 में लांच किए थे।

    इनके नाम एसएंडपी सीएनएक्स 500 शरिया (S & P CNX-500 shariah) और एसएंडपी निफ्टी शरिया (S & P nifty shariah)हैं। इन्हें एसएंडपी सीएनएक्स 500 और एसएंडपी निफ्टी में शामिल कंपनियों की जांच के बाद तैयार किया गया है।
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